ख़ुदा मिलता नहीं!

अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल,

मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं|

अकबर इलाहाबादी

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