आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में से एक महिला कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक कविता आज प्रस्तुत है| कीर्ति जी की इस कविता में पुष्पगुच्छों से युक्त एक लता के प्रति सहज आकर्षण का चित्रण किया गया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की यह कविता –

बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’
अब कहीं भी दिखती है
किसी के द्वार-वन-उपवन,
तो भला लगता है ।
धीरे-धीरे
जाने क्यों भूलती ही जाती हूँ मैं !
ख़ुद को, और अपनापन !
बस, भूलती नहीं है तो
बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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