उठे बादल !

आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक कवि स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी की इस कविता में वर्षा के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है|   

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की यह कविता

उधर उस नीम की कलगी पकड़ने को
झुके बादल।
नयी रंगत सुहानी चढ़ रही है
सब के माथे पर।
उड़े बगुल, चले सारस,
हरस छाया किसानों में।
बरस भर की नयी उम्‍मीद
छायी है बरसने के तरानों में।
बरस जा रे, बरस जा ओ नयी दुनिया के
सुख सम्‍बल।
पड़े हैं खेत छाती चीर कर
नाले-नदी सूने।
बिलखते दादुरों के साथ सूखे झाड़
रूखे झाड़।
हवा बेजान होकर सिर पटकती
रो रही सरसर।
जमीं की धूल है बदहोश
भूली आज अपना घर।
किलकता आ, बरसता आ,
हमारी ओ खुशी बेकल।
उधर वह आम का झुरमुट
नहीं हैं पास में पनवट।
किलकती कोकिला, बेमान हो कर देखती जब
चाँद मुखड़े पर घटा-सी छा गयी है लट।
खड़ी हैं सिर लिये गागर
तुम्‍हारी इन्तजारी में
दरद करती कमर, दिल काँपता है
बेकरारी में।
जहाँ की बादशाही भी जहाँ पर
सिर झुकाती है
उन्‍हीं कोमल किशोरी का
दुखा कर दिल
कभी रस ले सकोगे क्‍या अरे बेदिल?
उठे बादल, झुके बादल।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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