आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कविता स्वयं ही अपना और किसी हद तक अपने रचयिता का परिचय देती है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता –

एक दिन
पृथ्वी पर जन्मे
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊंगा मैं,
मिट जाएंगी मेरी स्मृतियाँ
मेरे नाम के शब्द भी हो जाएंगे
एक दूसरे से अलग
कोश में अपनी-अपनी जगह पहुँचने की
जल्दबाजी में
अपने अर्थ समेट लेंगे वे
शलभ कहीं होगा
कहीं होगा श्रीराम
और सिंह कहीं और
लघुता-मर्यादा और हिंस्र पशुता का
समन्वय समाप्त हो जाएगा एक दिन
एक दिन
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊँगा मैं भी।
फिर भी रहूंगा मैं
राख में दबे अंगारे की तरह
कहीं न कहीं अदृश्य, अनाम,अपरिचित
रहूंगा फिर भी-फिर भी मैं
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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