निर्विकल्प!

आज शायद पहली बार मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|

 उनको अपनी रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता

इसने नारे की हवाई छोड़ी
उसने भाषण की चर्खी
तीसरे ने योजना की महताब
चौथे ने सेमिनार का अनार
पाँचवे ने बहस के पटाखों की लड़ी
छठे ने प्रदर्शन की फुलझड़ी
-छन भर उजाले से आँखें चौंधिया गईं
पर फिर
खेल ख़त्म होते ही
और भी अदबदा कर अँधेरे ने घेर लिया ।

भाइयो,
सहधर्मियो !
सुनो, तुम्हें मन की एक बात बतलाता हूँ :
सूरज का कोई सब्स्टीट्यूट नहीं है
यहाँ तक कि चाँद भी
जितना उजाला है
उतना वह सूरज है !

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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