लगता है महसूल मियाँ!

‘इंशा’ जी क्या उज़्र है तुमको नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ नज़्र करो,

रूप-नगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियाँ|

इब्न-ए-इंशा

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