मेहनत हुई वसूल मियाँ!

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी शहर से निकलीं रुस्वा हूँ,

तुझ को देखा बातें कर लीं मेहनत हुई वसूल मियाँ|

इब्न-ए-इंशा

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