ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले,
वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो|
अहमद फ़राज़
A sky full of cotton beads like clouds
ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले,
वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो|
अहमद फ़राज़
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