ये सुकून-ए-जाँ !

ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले,

वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो|

अहमद फ़राज़  

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