उषा!

आज मैं प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनको कवियों का कवि कहा जाता है|

शमशेर जी की अधिक रचनाएँ मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| आज की इस कविता में भोर में सूर्योदय के समय का चित्रण किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता  –  

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे

भोर का नभ

राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)

बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से
कि धुल गयी हो

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
        मल दी हो किसी ने

नील जल में या किसी की
        गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो ।

और…
        जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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