इश्क़ की आबरू!

सर-ए-मक़्तल-ए-शब-ए-आरज़ू रहे कुछ तो इश्क़ की आबरू,

जो नहीं अदू तो ‘फ़राज़’ तू कि नसीब-ए-दार कोई तो हो|

अहमद फ़राज़  

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