पढ़ के मिटा दिया!

उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी, यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी,

जो कहा तो सुन के उड़ा दिया, जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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