करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न, मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो,
कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया|
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
A sky full of cotton beads like clouds
करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न, मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो,
कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया|
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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