क़ातिलों को गुमाँ न हो!

करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न, मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो,

कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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