यूँ दम-ब-दम निकले!

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर,

वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले|

मिर्ज़ा ग़ालिब

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