डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर,
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले|
मिर्ज़ा ग़ालिब
A sky full of cotton beads like clouds
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर,
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले|
मिर्ज़ा ग़ालिब
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