आज एक बार फिर से मैं भारतीय फिल्मों पर अपने गीतों के माध्यम से अमिट छाप छोड़ने वाले जनकवि स्वर्गीय शैलेंद्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| शैलेंद्र जी की बहुत सी रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी की यह रचना –

हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं,
जब हद से गुज़र जाती है ख़ुशी आँसू भी छलकते आते हैं|
पहलू में पराए दर्द बसा के हँसना-हँसाना सीख ज़रा,
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे हम प्यार के दीप जलाते हैं|
काँटों में खिले हैं फूल हमारे रंग भरे अरमानों के,
नादान हैं जो इन काँटों से दामन को बचाए जाते हैं|
जब ग़म का अँधेरा घिर आए समझो के सवेरा दूर नहीं
हर रात की है सौग़ात यही तारे भी यही दोहराते हैं |
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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