एक उमर मुस्कान की!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|  रंजक जी  की बहुत सी रचनाएँ तथा उनके बारे में अपने अनुभव मैंने पहले भी शेयर किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत

इतनी ही थी अवधि हमारी अनबोली पहचान की
जैसे लाज भरे होठों पर एक उमर मुस्कान की

पल भर का परिचय था लेकिन
सुघर घड़ी तस्वीर-सी
टँगी रही प्यासी आँखों में
आकृति एक लकीर-सी

गन्ध झूलती रही शिराओं में अधखिले विहान की
जैसे आँगन में सुधि झूले बिना रुके मेहमान की

सागर के सिरहाने, अम्बर का
सूनापन ओढ़ कर
खड़ी रही अनमनी विदाई
टूटी ख़ुशियाँ जोड़ कर

प्यास देखती रही दूर तक रेखाएँ जलयान की
जैसे पढ़े रोशनी कोई ग़ज़ल किसी दीवान की

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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