मगर पासबाँ तो है!

इक चील एक मुम्टी पे बैठी है धूप में,

गलियाँ उजड़ गई हैं मगर पासबाँ तो है|

मुनीर नियाज़ी

One response to “मगर पासबाँ तो है!”

  1. बहुत सुंदर।

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