उदित संध्या का सितारा!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी में गीत कवियों के सिरमौर रहे स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन  जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|  बच्चन जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में बहुत सी बातें भी लिखी हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की यह कविता

उदित संध्या का सितारा!

थी जहाँ पल पूर्व लाली,
रह गई कुछ रेख काली,
अब दिवाकर का गया मिट तेज सारा, ओज सारा!
उदित संध्या का सितारा!

शोर स्यारों ने मचाया,
’(अंधकार) हुआ’–बताया,
रात के प्रहरी उलूकों ने उठाया स्वर कुठारा!
उदित संध्या का सितारा!

काटती थी धार दिन भर
पाँव जिसके तेज चलकर,
चौंकना मत, अब गिरेगा टूट दरिया का कगारा!
उदित संध्या का सितारा!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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