हसरत-ए-नज़ारा नहीं!

जो तेरी दीद ने बख़्शे वही हैं ज़ख़्म बहुत,

अब अपने दिल में कोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं|

क़तील शिफ़ाई

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