खिलते फूल मिलाप के

ये चली है कैसी हवा कि अब नहीं खिलते फूल मिलाप के,

कभी दौर-ए-फ़स्ल-ए-बहार था तुम्हें याद हो कि न याद हो|

अर्श मलसियानी

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