अवशिष्ट!

आज एक बार मैं फिर से प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार और संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| भारती जी ने साहित्य की प्रत्येक विधा में अपना अमूल्य योगदान किया था| भारती जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत  

दुख आया
घुट घुटकर
मन-मन मैं खीज गया

सुख आया
लुट लुटकर
कन कन मैं छीज गया

क्या केवल
इतनी पूँजी के बल
मैंने जीवन को ललकारा था

वह मैं नहीं था, शायद वह
कोई और था
उसने तो प्यार किया, रीत गया, टूट गया
पीछे मैं छूट गया
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(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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