वक्त!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का  एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत  

वक्त कभी माटी का, वक्त कभी सोने का

पर न किसी हालत में यह अपना होने का ।


मिट्टी से बने महल, मिट्टी में मिले महल

खो गई खंडहरों में वैभव की चहल-पहल

बाजबहादुर राजा, रानी वह रूपमती

दोनों को अंक में समेट सो रही धरती


रटते हैं तोते इतिहास की छड़ी से डर

लेकिन यह सबक कभी याद नहीं होने का ।


सागर के तट बनते दम्भ के घरौंदे ये

ज्वार के थपेड़ों से टूट बिखर जाएंगे

टूटेगा नहीं मगर ये सिलसिला विचारों का

लहरों के गीत समय-शंख गुनगुनाएंगे


चलने पर संग चला सिर पर नभ का चंदा

थमने पर ठिठका है पाँव मिरगछौने का ।


बांध लिया शब्दों को मुट्ठी में दुनिया को

द्वार ही न मिला मुक्ति का जिसको मांगे से

सोने की ढाल और रत्न-जड़ी तलवारें

हारती रहीं कुम्हार के कर के धागे से


सीखा यों हमने फ़न सावन की बदली में

सावन के रंग और नूर को पिरोने का ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “वक्त!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🧡

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