बनेंगी साँपिन!

आज एक बार फिर से मैं मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का  एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत  

बंद हैं मुट्ठी में
चंद सुर्ख-पंक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
धरती पर रेंगकर-बनेंगी साँपिन।

अपने ही आपमें
हम इतना डूबे
बदल गए अनजाने
सारे मंसूबे
बंद हैं मुट्ठी में
थोथी आसक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
सबको खा जाएगी पीड़ा डायन।

एक अदद गुलदस्ता
टूक-टूक बिखरा
झरी हुई पत्तियाँ
जाते जाते भी
धरती पर फेंक गईं
एक नया “फिकरा”-
बंद हैं मुट्ठी में
अनजानी शक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
खुद ही खुल जाएँगे-कैदी सब दिन।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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