काली सलाखों में बंद!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का  एक गीत शेयर कर रहा हूँ|  सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत  

रात, में घूमता रहा काली सलाखों में बंद
कोई दरवाजा मिले तो कहीं, किसी ओर
मन के कोलाहल से
बाँधूँ मैं बाहर का शोर
बैठती गयी कोई
ध्रुवान्तर उड़ान मेरी पंखों में बंद

थूक गया फिर कोई
झर गया गुलाब
सहा फिर हवाओं ने
धुएँ का नकाब
कटे हाथों के टीले
उधड़े वक्ष
प्रश्न जड़ी खिड़कियाँ मेरी आँखों में बंद

उगी नही बोई हुई रौशनी
सन्नाटा पिए बंजर खेत
पीटते रहे गीली ख़ालो के ढोल
अंधे द्वीपों के प्रेत
मृत्यु – कथा बाँचते पहाड़ों पर
झुलस गया भोर का वसंत
नंगी शाखों में बंद

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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