कुछ याद-जज़ीरे हैं!

कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में,

कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते|

अहमद फ़राज़

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