भला मेरी ज़बाँ क्यूँ हो!

मैं ज़िंदा हूँ तो इस ज़िंदा-ज़मीरी की बदौलत ही,

जो बोले तेरे लहजे में भला मेरी ज़बाँ क्यूँ हो|

वसीम बरेलवी

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