दरमियाँ क्यूँ हो!

मोहब्बत आसमाँ को जब ज़मीं करने की ज़िद ठहरी,

तो फिर बुज़दिल उसूलों की शराफ़त दरमियाँ क्यूँ हो|

वसीम बरेलवी

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