कोई मेहरबाँ क्यूँ हो!

उम्मीदें सारी दुनिया से ‘वसीम’ और ख़ुद में ऐसे ग़म,

किसी पे कुछ न ज़ाहिर हो तो कोई मेहरबाँ क्यूँ हो|   

वसीम बरेलवी

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