उर पर पत्थर धर दो!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी गीत जगत के विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब बच्चन जी ने गीत के श्रोताओं को दीवाना बना दिया था और दूर-दूर से लोग उनका काव्य पाठ सुनने के लिए जाते थे| बच्चन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की यह रचना  

मेरे उर पर पत्थर धर दो!

जीवन की नौका का प्रिय धन
लुटा हुआ मणि-मुक्ता-कंचन
तो न मिलेगा, किसी वस्तु से इन खाली जगहों को भर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

मंद पवन के मंद झकोरे,
लघु-लघु लहरों के हलकोरे
आज मुझे विचलित करते हैं, हल्का हूँ, कुछ भारी कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

पर क्यों मुझको व्यर्थ चलाओ?
पर क्यों मुझको व्यर्थ बहाओ?
क्यों मुझसे यह भार ढुलाओ? क्यों न मुझे जल में लय कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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