कोई टूटे हुए शीशे लिए अफ़्सुर्दा-ओ-मग़्मूम,
कब तक यूँ गुज़ारे बे-तलब बे-आरज़ू दिन,
तो इन ख़्वाबों की किर्चें हम ने पलकों से झटक दीं पर,
नए अरमाँ सजाने में अभी कुछ दिन लगेंगे|
जावेद अख़्तर
A sky full of cotton beads like clouds
कोई टूटे हुए शीशे लिए अफ़्सुर्दा-ओ-मग़्मूम,
कब तक यूँ गुज़ारे बे-तलब बे-आरज़ू दिन,
तो इन ख़्वाबों की किर्चें हम ने पलकों से झटक दीं पर,
नए अरमाँ सजाने में अभी कुछ दिन लगेंगे|
जावेद अख़्तर
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