नए अरमाँ सजाने में!

कोई टूटे हुए शीशे लिए अफ़्सुर्दा-ओ-मग़्मूम,

कब तक यूँ गुज़ारे बे-तलब बे-आरज़ू दिन,

तो इन ख़्वाबों की किर्चें हम ने पलकों से झटक दीं पर,

नए अरमाँ सजाने में अभी कुछ दिन लगेंगे|

जावेद अख़्तर

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