जाग उट्ठी ज़िंदगानी!

अँधेरे ढल गए रौशन हुए मंज़र ज़मीं जागी फ़लक जागा,

तो जैसे जाग उट्ठी ज़िंदगानी,

मगर कुछ याद-ए-माज़ी ओढ़ के सोए हुए लोगों को लगता है जगाने में

अभी कुछ दिन लगेंगे|

जावेद अख़्तर

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