एक चाय की चुस्की!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|  मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना  

एक चाय की चुस्की
एक कहकहा
अपना तो इतना सामान ही रहा ।

चुभन और दंशन
पैने यथार्थ के
पग-पग पर घेर रहे
प्रेत स्वार्थ के ।
भीतर ही भीतर
मैं बहुत ही दहा
किंतु कभी भूले से कुछ नहीं कहा ।

एक अदद गंध
एक टेक गीत की
बतरस भीगी संध्या
बातचीत की ।
इन्हीं के भरोसे क्या-क्या नहीं सहा
छू ली है सभी, एक-एक इन्तहा ।

एक क़सम जीने की
ढेर उलझनें
दोनों ग़र नहीं रहे
बात क्या बने ।
देखता रहा सब कुछ सामने ढहा
मगर कभी किसी का चरण नहीं गहा ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “एक चाय की चुस्की!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    ❤️

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