याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’!

याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’ उस शाम की तन्हाइयाँ,

एक मैदाँ इक दरख़्त और तू ख़ुदा के सामने|   

मुनीर नियाज़ी

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