जाँ-निसार चले गए!

तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए,

तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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