पलकें बोझल रहती थीं!

एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं,
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं|

जावेद अख़्तर

One response to “पलकें बोझल रहती थीं!”

Leave a reply to Rooppendra Kumar Cancel reply