लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें!

ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली,
क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें|

मोहसिन नक़वी

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