एक बार फिर से मैं आज, मेरे लिए गुरू तुल्य रहे और बड़े भाई की तरह प्रेम करने वाले स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

दृष्टि हटी जब भी
मन-पुस्तक के पेज से
फिसल गईं स्वीकृतियाँ
जीवन की मेज से।
हाथों को
मिली हुई
लेखनी बबूल की
दासी जो मेहनत के
साँवरे उसूल की
जितने ही
प्राण रहे मेरे परहेज से।
फिसल गई थीं खुशियाँ
जीवन की मेज से।
गलत दिशा
चुनी अगर
कागज के पेट ने
उसको सम्मान दिया
हर “पेपर वेट” ने
ब्याही जाती
खुशियाँ झूठ के दहेज से।
फिसल गईं स्वीकृतियाँ
जीवन की मेज से।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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