श्री माहेश्वर तिवारी जी हिन्दी नवगीत के प्रमुख कवियों में शामिल हैं| आज मैं श्री माहेश्वर तिवारी जी का नवगीत नहीं अपितु तीन छोटी-छोटी कविताएं शेयर कर रहा हूँ, जिनका संदेश बड़ा है|
लीजिए प्रस्तुत हैं श्री माहेश्वर तिवारी जी की यह कविताएं –

एक
हमारे सामने
एक झील है
नदी बनती हुई
एक नदी है
महासागर की अगाधता की
खोल चढ़ाए हुए
एक समुद्र है
द्विविधा के ज्वार-भाटों में
फँसा हुआ
हमें अपनी भूमिका का चयन करना है ।
दो
आया है जबसे
यह सिरफिरा वसन्त
सारा वन
थरथर काँप रहा है
ऋतुराज भी शायद डरावना होता है
ऐसा ही होता होगा
तानाशाह ।
तीन
नया राजा आया
जैसे वन में आते हैं नए पत्ते
और फूल
पियराये झरे पत्तों की
सड़ांध से निकलकर
सबने ख़ुश होकर बजाए ढोल, नगाड़े
अब वह ढोल और नगाड़े राजा के
पास हैं
जिनके सहारे वह
हमारी चीख़ और आवाज़ों से
बच रहा है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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