फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे!

फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे,
कुछ उस लब के सुनने-सुनाने की रातें|

फ़िराक़ गोरखपुरी

2 responses to “फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे!”

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji

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