आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| इनको साहित्य के क्षेत्र में अनेक सम्मानों के साथ ही पद्मश्री सम्मान देने की भी पेशकश की गई थी जिसको उन्होंने अस्वीकार कर दिया था|
लीजिए, प्रस्तुत है स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की यह रचना-

जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
किसने बाँसुरी बजाई
अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई !
किसने बाँसुरी बजाई
जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग
कूक सुना सोए-सोए हिय मे हूक जगाई !
किसने बाँसुरी बजाई
मसक-मसक रहता मर्मस्थल मरमर करते प्राण
कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई !
किसने बाँसुरी बजाई
उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्याला
निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्काई !
किसने बाँसुरी बजाई|
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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