आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी उल्लेख किया है रंजक जी को काव्य-पाठ करते हुए सुनने का अनुभव बहुत सुंदर होता था और मेरा सौभाग्य है कि मुझे यह अवसर अनेक बार मिला है|
मैंने पहले भी स्वर्गीय रमेश रंजक जी के बहुत से नवगीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है रंजक जी का यह सुंदर नवगीत–

माणिक अधर, नीलमी आँखें
ये पुखराज बदन
मन घायल कर गई तुम्हारी
हीरकनी चितवन
श्वेत शिला-सी दिपे
मोतिया
अँगिया कसी-कसी
रखनख-मणि, पन्नई
चूनरी
लहरे नागिन-सी
कैसे पाए प्राण जौहरी
ये अनमोल रतन ?
पग पर मूँगा रंग
महावर
शीश कटी मछली
हाथों पर गोमधिया
मेंहदी
सतरंगी तितली
कोमल काया से क्यों बाँधा
इतना पाहनपन ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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