आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि, सीनियर बच्चन जी की एक सुंदर रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों की शान हुआ करते थे, उनको सुनने के लिए श्रोतागण दूर-दूर से कवि सम्मेलनों में आते थे|
मैंने पहले भी बच्चन जी के बहुत से गीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की यह सुंदर रचना–

मूल्य दे सुख के क्षणों का!
एक पल स्वच्छंद होकर
तू चला जल, थल, गगन पर,
हाय! आवाहन वही था विश्व के चिर बंधनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
पा निशा की स्वप्न छाया
एक तूने गीत गाया,
हाय! तूने रुद्ध खोला द्वार शत-शत क्रंदनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आँसुओं से ब्याज भरते
अनवरत लोचन सिहरते,
हाय! कितना बढ़ गया ॠण होंठ के दो मधुकणों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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