अपनी युवावस्था में, जब मैं दिल्ली-शाहदरा में रहता था, नई नई नौकरी शुरू की थी और कविता का शौक भी नया नया था| उस समय जिन कवियों को अक्सर गोष्ठियों आदि में सुनने का मौका मिल जाता था, उनमें शेरजंग गर्ग जी भी शामिल थे| मैंने पहले भी शायद उनकी एक-दो रचनाएं शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की यह ग़ज़ल –

ग़लत समय में सही बयानी
सब मानी निकले बेमानी
जिसने बोया, उसने काटा
हुई मियाँ यह बात पुरानी
किसको ज़िम्मेदारी सौंपे
हर सूरत जानी पहचानी
कौन बनाए बिगड़ी बातें
सीख गए सब बात बनानी
कुछ ही मूल्य अमूल्य बचे हैं
कौन करे उनकी निगरानी
आन-मान पर जो न्यौछावर
शख्स कहाँ ऐसे लासानी
जीना ही दुश्वार हुआ है
मरने में कितनी आसानी
विद्वानों के छक्के छूटे
ज्ञान बघार रहे अज्ञानी
जबसे हमने बाज़ी हारी
उनको आई शर्त लगानी
कुर्सी-कुर्सी होड़ लगी है
दफ्तर-दफ्तर खींचा-तानी
जन-मन-गण उत्पीड़ित पीड़ित
जितनी व्यर्थ गई कुरबानी
देश बड़ा हैं, देश रहेगा
सरकारे तो आनी-जानी
हम न सुनेंगे, हम न कहेंगे
कोउ नृप होय,हमै का हानी?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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