माशो की माँ!

हिन्दी में हास्य व्यंग्य के एक प्रमुख कवि हैं श्री अशोक चक्रधर जी, लेकिन आज मैं उनकी जो कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ वह हास्य-व्यंग्य की नहीं अपितु अत्यंत भावपूर्ण कविता है, जो टमाटर बेचने वाली एक वृदधा के बारे में लिखी गई है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह भावपूर्ण कविता –

नुक्कड़ पर माशो की माँ
बेचती है टमाटर।

चेहरे पर जितनी झुर्रियाँ हैं
झल्ली में उतने ही टमाटर हैं।

टमाटर नहीं हैं
वो सेव हैं,
सेव भी नहीं
हीरे-मोती हैं।

फटी मैली धोती से
एक-एक पोंछती है टमाटर,
नुक्कड़ पर माशो की माँ।

गाहक को मेहमान-सा देखती है
एकाएक हो जाती है काइयाँ
–आठाने पाउ
लेना होय लेउ
नहीं जाउ।

मुतियाबिंद आँखों से
अठन्नी का ख़रा-खोटा देखती है
और
सुतली की तराजू पर
बेटी के दहेज-सा
एक-एक चढ़ाती है टमाटर
नुक्कड़ पर माशो की माँ।

–गाहक की तुष्टि होय
एक-एक चढ़ाती ही जाती है
टमाटर।

इतने चढ़ाती है टमाटर
कि टमाटर का पल्ला
ज़मीन छूता है
उसका ही बूता है।

सूर्य उगा– आती है
सूर्य ढला– जाती है
लाती है झल्ली में भरे हुए टमाटर
नुक्कड़ पर माशो की माँ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “माशो की माँ!”

  1. अशोक चक्रधर जी की सुंदर कविता है ।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      जी, बिल्कुल सही कहा आपने।

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