एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक अत्यंत लोकप्रिय और सृजनशील रचनाकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| प्रेम के कवि सोम जी ने राष्ट्र, राष्ट्रभाषा और मानवता की भावभूमि पर अनेक प्रसिद्ध रचनाएं लिखी हैं|
श्री सोम ठाकुर जी ने अनेक बार मेरे संस्थान के लिए आयोजित कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया है, इस प्रकार अनेक बार उनका स्नेह और आशीष मुझे प्राप्त हुआ है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत –

हेमंत की पैनी हवा
वेला हुई संवत्सरा
जैसे शकुन तिथि तीज का
यह जन्म ऋतु – संबीज का
लेकर परीक्षित गोद में
घूमे अधीरा उत्तरा
लो, दृष्टि आँके ताल की
छवियाँ अपत्रित डाल की
निरखे खुला आकाश भी
यह सृष्टि नील दिगंबरा
मुक्ता बनेगी हर व्यथा
सुनकर हरी अपनी कथा
है आज तो पतझार से
हर ओर पीत वसुंधरा|
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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