प्रसिद्ध शायर और फिल्मी गीतकार गुलज़ार साहब की एक नज़्म आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| गुलज़ार साहब अपनी शायरी और फिल्मी गीतों में भी नए-नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं| गुलज़ार साहब के लिखे गीत, ग़ज़ल और नज़्में अपना अलग ही मुकाम रखती हैं, एक अलग पहचान उन्होंने हर क्षेत्र में बनाई है|
लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की लिखी यह नज़्म –

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकीं
तुमने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दी
रात भर जो मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने|
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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