एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बड़े सहज अंदाज़ में अपनी गहरी बात कह जाते थे| आज की कविता में भवानी दादा ने यह विषय रखा है कि किस प्रकार अपने भीतर को बाहर से जोड़ने पर ही रचनाकार प्रभावी रचना लिख सकता है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्री भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता–

तुम भीतर जो साधे हो
और समेटे हों
कविता नहीं बनेगी वह
क्योंकि
कविता तो बाहर है तुम्हारे
अपने भीतर को
बाहर से जोड़ोगे नहीं
बाहर
जिस-जिस तरफ़ जहाँ -जहाँ
जा रहा है
अपने भीतर को
उस-उस तरफ़ वहाँ -वहां
मोड़ोगे नहीं
और
पहचान नहीं होने दोगे
अब तक के इन दो-दो
अनजानों की
तो तुम्हारी कविता की
तुम्हारे गीत-गानों की
गूँज-भर
फैलेगी कभी और कहीं
नहीं खिलेंगे अर्थ
बहार के उन बंजरों में
जहाँ खिले बिना
कुछ नहीं होता गुलाब
कुछ नहीं होता हिना
कुछ नहीं
जाता है ठीक गिना ऐसे में
उससे जिसका नाम
काल है
बड़ा हिसाबी है काल
वह तभी लिखेगा
अपनी बही के किसी
कोने में तुम्हें
जब तुम
भीतर और बाहर को
कर लोगे
परस्पर एक ऐसे
जैसे जादू-टोने में
खाली मुट्ठी से
झरता है ज़र
झऱ झऱ झऱ
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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