कुछ सूखे फूलों के गुलदस्ते!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी किस्म के अनूठे कवि थे| बातचीत के लहज़े में कविता कहने का उनका निराला अंदाज़ था| मैंने पहले भी भवानी दादा की कुछ कविताएं शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है, हमारे भवानी दादा की यह कविता, जिसमें अभिव्यक्ति का एक अनूठा उदाहरण मिलता है –

कुछ सूखे फूलों के
गुलदस्तों की तरह
बासी शब्दों के
बस्तों को
फेंक नहीं पा रहा हूँ मैं

गुलदस्ते
जो सम्हालकर
रख लिये हैं
उनसे यादें जुड़ी हैं

शब्दों में भी
बसी हैं यादें
बिना खोले इन बस्तों को

बरसों से धरे हूँ
फेंकता नहीं हूँ
ना देता हूँ किसी शोधकर्ता को

बासे हो गये हैं शब्द
सूख गये हैं फूल
मगर नक़ली नहीं हैं वे न झूठे हैं!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “कुछ सूखे फूलों के गुलदस्ते!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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