आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ |
लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत –

दुख आया
घुट घुटकर
मन-मन मैं खीज गया|
सुख आया
लुट लुटकर
कन कन मैं छीज गया|
क्या केवल
इतनी पूँजी के बल
मैंने जीवन को ललकारा था|
वह मैं नहीं था, शायद वह
कोई और था
उसने तो प्यार किया, रीत गया, टूट गया
पीछे मैं छूट गया|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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