बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ!

ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगी,
बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ|

कैफ़ भोपाली

2 responses to “बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ!”

  1. वाह, बहुत खूब |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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