आज स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी का लिखा एक सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| फिल्म- ‘काजल’ के लिए इस गीत का संगीत रवि जी ने दिया था और इसको आशा भौंसले जी ने अपनी मधुर वाणी में गाया है जो आज तक हमारे मन में गूँजता है|
लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मधुर गीत के बोल –

प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विधि पाऊँ तोहे,
प्रभु कहे तू मन को पा ले, पा जायेगा मोहे|
तोरा मन दर्पण कहलाये,
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|
मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय,
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय,
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये
सुख की कलियाँ, दुख के कांटे, मन सबका आधार,
मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार,
जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|
तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल,
तन के कारण मन के धन को मत माटी में रौंद,
मन की क़दर भुलानेवाला वीराँ जनम गवाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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